खाद के लिए अन्नदाता की हाय-तौबा

वीडियो संदेशों तक सिमटे कृषि अधिकारी, पहले ही दिन ध्वस्त हुई डीएपी वितरण व्यवस्था

खाद के लिए अन्नदाता की हाय-तौबा
स्टेट एग्रो की गोदाम के बाहर परेशान होते दिखे किसान।

गुना।दयालवाणी

अन्नदाता कहे जाने वाले किसानों की किस्मत में शायद हमेशा संघर्ष ही लिखा है। गुना जिले में रबी सीजन की शुरूआत होते ही खाद के लिए किसानों की भटकन एक बार फिर से सतह पर आ गई है। स्थिति यह है कि पहले ही दिन जिले की डीएपी वितरण व्यवस्था पूरी तरह से धाराशायी हो चुकी है। कृषि विभाग के अधिकारी एसी कमरों और वीडियो संदेशों की दुनिया से बाहर निकलने को तैयार नहीं हैं, जबकि हकीकत यह है कि मैदान में किसान एक-एक बोरी खाद के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं।

एक तरफ गुना जिले का कृषि महकमा और खुद उप संचालक महोदय लगातार वीडियो संदेश जारी कर यह ताल ठोक रहे हैं कि जिले में खाद की कोई कमी नहीं है, वहीं दूसरी ओर गोदामों के बाहर किसानों का सब्र टूट रहा है। हालत यह है कि एमपी एग्रो के गोदामों पर खाद वितरण पूरी तरह से अव्यवस्थाओं की भेंट चढ़ चुका है। हालात इतने बदतर हैं कि खाद पाने की जद्दोजहद में किसानों की आंखों में आंसू आ रहे हैं, और वे धक्के खाने के बाद खाली हाथ लौटने को विवश हैं। किसानों की इस बदहाली को देखकर अब कृषि विभाग और प्रशासन के दावों पर से किसानों का भरोसा पूरी तरह उठ चुका है।

ग्वालियर संभाग में गुना को मिला सबसे कम आवंटन

सिर्फ आम किसान ही नहीं, बल्कि सत्ताधारी दल के नेताओं ने भी इस व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। स्थानीय भाजपा नेताओं ने केंद्रीय मंत्री एवं सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को पत्र लिखकर इस बात का खुलासा किया है कि ग्वालियर संभाग में गुना जिले को सबसे कम खाद का आवंटन प्राप्त हुआ है। सूत्रों के मुताबिक, इस समय गुना जिले में कुल बुवाई का रकबा करीब 3.36 लाख हेक्टेयर है, जिसके चलते किसानों को तत्काल और पर्याप्त मात्रा में खाद की दरकार है। लेकिन कम आवंटन के कारण यह जरूरत पूरी होती नहीं दिख रही है।

एनपीके के बढ़े दाम और ई-टोकन की पेचीदगियों ने बढ़ाई मुसीबत

इस बार संकट के पीछे एक बड़ा आर्थिक कारण भी जुड़ा हुआ है। जानकारों के अनुसार, पिछले सालों में एनपीके खाद की कीमतें कम हुआ करती थीं, इसलिए किसान विकल्प के रूप में उसे खरीद लेते थे। लेकिन इस साल गणित बिल्कुल उल्टा हो गया है। वर्तमान में एनपीके की दरें डीएपी की तुलना में काफी ज्यादा हैं, जिस वजह से किसान महंगा एनपीके खरीदने में असमर्थ हैं। यही वजह है कि किसान केवल और केवल डीएपी खाद की मांग कर रहे हैं। इस आग में घी का काम कर रही है ई-टोकन की जटिल प्रक्रिया। जिले के करीब 15 से 20 हजार किसान सॉफ्टवेयर की तकनीकी खामियों के चलते बुरी तरह फंस गए हैं। सिस्टम की गड़बड़ी के कारण इन किसानों के आॅनलाइन खातों में मक्का और सोयाबीन की जगह 'धान' का रकबा दर्ज हो गया है। नियम यह है कि धान की बोवनी करने वाले किसानों को डीएपी की पात्रता नहीं होती, जिसके चलते उनके ई-टोकन बुक ही नहीं हो पा रहे हैं। जबकि हकीकत यह है कि इन किसानों ने अपने खेतों में मक्का और सोयाबीन बोई है।

अधिकारी चैंबरों में कैद, समाधान की दरकार

एक तरफ किसान खाद के गोदामों पर धक्के खा रहा है और तकनीकी त्रुटियों के जाल में उलझा है, तो दूसरी तरफ कृषि विभाग के जिम्मेदार अधिकारी केवल चुनिंदा दौरों या नेताओं के साथ फोटो खिंचवाने तक सीमित नजर आ रहे हैं। जमीनी हकीकत यह है कि अधिकारी अपने आरामदायक चैंबरों से बाहर झांकने को तैयार नहीं हैं। यदि जल्द ही इस ध्वस्त हो चुकी वितरण प्रणाली और ई-टोकन की तकनीकी खामियों को दुरुस्त नहीं किया गया, तो अन्नदाता का यह आक्रोश कभी भी बड़ा रूप ले सकता है। गुना के किसानों को अब वीडियो संदेशों या झूठे आश्वासनों की नहीं, बल्कि ठोस और त्वरित कार्रवाई की सख्त जरूरत है।