स्वामित्व योजना के नए प्रावधानों पर पटवारियों का विरोध, कलेक्ट्रेट में सौंपा ज्ञापन

पटवारी बोले—निष्पादन और पंजीयन की कानूनी जिम्मेदारी से रखा जाए मुक्त, तकनीकी सहयोग देने को तैयार

स्वामित्व योजना के नए प्रावधानों पर पटवारियों का विरोध, कलेक्ट्रेट में सौंपा ज्ञापन
कलेक्ट्रेट में उमड़ा पटवारियों का हुजूम।

गुना |दयालवाणी

प्रदेश सरकार द्वारा शुरू की गई 'स्वामित्व अधिकार अभिलेख निष्पादन एवं पंजीयन योजना 2026' को लेकर मध्य प्रदेश के राजस्व तंत्र की सबसे अहम कड़ी यानी पटवारी अब आर-पार की लड़ाई के मूड में नजर आ रहे हैं। ग्रामीण धरातल पर जमीन-जायदाद के रिकॉर्ड को पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई इस योजना का दूसरा चरण लागू होते ही विरोध के सुर तेज हो गए हैं।

योजना के नए दिशा-निदेर्शों में पटवारियों को 'निष्पादक' (एग्जीक्यूटर) की महत्वपूर्ण और सीधी जिम्मेदारी सौंप दी गई है, जिसे लेकर पटवारी संघ में गहरा असंतोष व्याप्त है। इसी विरोध के सिलसिले में पटवारी संघ ने एकजुट होकर कलेक्ट्रेट परिसर में हुंकार भरी और मुख्यमंत्री के नाम एक विस्तृत ज्ञापन प्रशासनिक अधिकारियों को सौंपा। ज्ञापन में पटवारियों ने बेहद साफ शब्दों में अपनी व्यथा बयां करते हुए मांग रखी है कि उन्हें इस योजना के निष्पादन और पंजीयन जैसे सीधी वैधानिक जवाबदेही वाले दायित्वों से पूरी तरह मुक्त रखा जाए। पटवारियों का दर्द केवल अतिरिक्त काम को लेकर नहीं है, बल्कि इसके पीछे छिपी भविष्य की कानूनी पेचीदगियां और अदालती कार्रवाइयों का गहरा खौफ है। संघ के पदाधिकारियों का कहना है कि जब केंद्र सरकार ने इस योजना की शुरूआत की थी, तब पटवारियों ने पूरी निष्ठा के साथ सीमांकन और सर्वेक्षण का काम किया था, जिसके सकारात्मक परिणाम ग्रामीण क्षेत्रों में देखने को भी मिले। लेकिन अब उन्हें सीधे तौर पर दस्तावेजों का निष्पादक बना दिया गया है। पटवारियों का स्पष्ट कहना है कि वे कड़ी मेहनत या काम की अधिकता से पीछे हटने वाले नहीं हैं, लेकिन ग्रामीण अंचलों में भूमि विवाद बेहद संवेदनशील और उलझे हुए होते हैं। यदि कल को किसी संपत्ति या दस्तावेज को लेकर पारिवारिक या वैधानिक विवाद उत्पन्न होता है, तो निष्पादक होने के नाते गाज सीधे पटवारी पर गिरेगी और उन्हें अपने मूल राजस्व कार्यों को छोड़कर सालों-साल अदालतों के चक्कर काटने पड़ेंगे।

क्या है स्वामित्व योजना 2026 और क्यों गहराया विवाद?

स्वामित्व योजना मूल रूप से ग्रामीण आबादी क्षेत्र में संपत्ति धारकों को उनकी जमीन का मालिकाना हक (प्रॉपर्टी कार्ड) देने की एक महत्वाकांक्षी पहल है, जो मुख्य रूप से पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अंतर्गत आती है। इसमें ड्रोन तकनीक और आधुनिक मैपिंग के जरिए आबादी भूमि का सीमांकन कर ग्रामीणों को उनके मकान व जमीन के आधिकारिक अभिलेख सौंपे जाते हैं, ताकि वे अपनी संपत्ति पर बैंक लोन ले सकें और भूमि विवाद समाप्त हों।

विवाद का कारण

योजना के दूसरे चरण (2026) में सरकार ने अधिकारों के निष्पादन और रजिस्ट्री/पंजीयन की सीधी जिम्मेदारी पटवारियों पर डाल दी है। पटवारियों का तर्क है कि मूल विभाग पंचायत का होने के कारण पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका मुख्य होनी चाहिए, न कि पटवारी की। संघ के प्रतिनिधियों ने अपने ज्ञापन के माध्यम से सरकार का ध्यान इस व्यावहारिक समस्या की ओर आकर्षित कराया है। उनका कहना है कि योजना का ढांचा और संचालन मूल रूप से पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग से जुड़ा हुआ है, इसलिए जमीनी स्तर पर इसकी प्रमुख जवाबदेही और भूमिका ग्राम पंचायतों की होनी चाहिए। वर्तमान व्यवस्था में पूरी जिम्मेदारी पटवारियों के कंधों पर डाल देना न्यायसंगत नहीं है। इससे न केवल पटवारियों की दैनिक कार्यप्रणाली प्रभावित होगी, बल्कि उन पर मानसिक दबाव भी अत्यधिक बढ़ जाएगा। पटवारी संघ ने सरकार को सुझाव दिया है कि योजना के सफल क्रियान्वयन के लिए राजस्व अमले के रूप में उनका तकनीकी और मैदानी सहयोग अवश्य लिया जाए, लेकिन उन्हें पंजीयन व निष्पादन जैसे कानूनी रूप से संवेदनशील दायित्वों से अलग रखा जाए ताकि वे निर्भीक होकर अपना मूल कार्य कर सकें।