मसूरिया गांव में दो मासूमों की संदिग्ध मौत

स्वास्थ्य विभाग के दावों की खुली पोल, अधिकारी झाड़-फूंक का ठीकरा फोड़कर झाड़ रहे पल्ला

मसूरिया गांव में दो मासूमों की संदिग्ध मौत
बमौरी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र

गुना। दयालवाणी

जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी हकीकत एक बार फिर दावों के विपरीत नजर आई है। बमोरी इलाके के मसूरिया गांव में दो मासूम बच्चों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत का मामला सामने आया है। इस दुखद घटना के बाद जहां एक ओर पूरे गांव में मातम और दहशत का माहौल है, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारी अपनी नाकामी छुपाने के लिए मृत बच्चों के परिजनों पर ही झाड़-फूंक कराने का बेतुका आरोप मढ़ते नजर आ रहे हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, बमोरी क्षेत्र के मसूरिया गांव में रहने वाले बनवारी लाल खेरुआ के दो बेटे—3 वर्षीय धर्मेंद्र और 5 वर्षीय राज—अचानक गंभीर रूप से बीमार हो गए। दोनों बच्चों को सांस लेने में तेज तकलीफ होने लगी। हालत इतनी तेजी से बिगड़ी कि बड़ा भाई राज घर पर ही जिंदगी की जंग हार गया और उसने दम तोड़ दिया। इसके बाद परिजनों ने आनन-फानन में छोटे बेटे धर्मेंद्र को बचाने की कोशिश की और उसे गंभीर हालत में बमोरी स्वास्थ्य केंद्र लेकर पहुंचे। वहां से डॉक्टरों ने स्थिति गंभीर देखते हुए उसे जिला अस्पताल रेफर कर दिया। बच्चे के पिता बनवारी लाल ने दर्द बयां करते हुए बताया कि जब वे धर्मेंद्र को लेकर जिला अस्पताल जा रहे थे, तो रास्ते में ही उसने भी दम तोड़ दिया। एक साथ दो सगे भाइयों की मौत से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है।

जिम्मेदारी से भागता स्वास्थ्य विभाग और अटपटे आरोप

घटना की भनक लगते ही स्वास्थ्य विभाग का अमला हरकत में आया और टीम मसूरिया गांव पहुंची। लेकिन जिस घातक और संदिग्ध बीमारी से दोनों मासूमों की जान गई, उसका वैज्ञानिक कारणों से पता लगाने के बजाय बमोरी के जिम्मेदार स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. हेमंत धाकड़ अजीबोगरीब बयानबाजी करते दिखे। उन्होंने बीमारी की जड़ तक पहुंचने के बजाय सारा ठीकरा परिजनों के सिर फोड़ते हुए उन पर झाड़-फूंक कराने का आरोप लगा दिया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि घटना के तीन दिन बीत जाने के बाद भी स्वास्थ्य विभाग यह स्पष्ट नहीं कर पाया है कि आखिर यह कौन सी संदिग्ध बीमारी थी, जिसने दो मासूमों की जान ले ली। विभाग यह भी बताने में असमर्थ है कि इस बीमारी की चपेट में गांव के अन्य बच्चे आए हैं या नहीं। महज कागजी और दिखावे की औपचारिकता पूरी कर विभाग सब कुछ सामान्य होने का दावा कर रहा है।

सरकारी तंत्र पर उठ रहे गंभीर सवाल

इस पूरी घटना ने ग्रामीण अंचल की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की पोल खोलकर रख दी है। सवाल यह उठता है कि जब मसूरिया गांव से महज 3 किलोमीटर की दूरी पर उप-स्वास्थ्य केंद्र और 10 किलोमीटर की दूरी पर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मौजूद है, तथा गांव में आशा कार्यकर्ता की तैनाती भी है, तब भी यह सरकारी तंत्र समय पर इन आदिवासी बच्चों की जान क्यों नहीं बचा पाया? इस दर्दनाक हादसे के बाद से गांव के अन्य बच्चों के माता-पिता डरे हुए हैं और उनमें भारी रोष व्याप्त है। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि इस संदिग्ध बीमारी की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और स्वास्थ्य विभाग के लापरवाह अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए, ताकि भविष्य में किसी अन्य मासूम को इस तरह अपनी जान न गंवानी पड़े।

बीएमओ ने की मौत की पुष्टि, लेकिन संक्रमण से इंकार

खंड चिकित्सा अधिकारी डॉ. हेमंत धाकड़ ने दो बच्चों की मौत की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि गांव की कुल संख्या 742 की जनसंख्या है, 109 लोग बाहर हैं। पूरे गांव की स्क्रीनिंग की है। गांव में ऐसी कोई बीमारी नहीं पाई गई, जो संक्रमण से होती है। कई बच्चों के सैंपल लिए गए हैं। जिन बच्चों की मौत हुई है, उनके बारे में पुरानी बीमारी की जानकारी नहीं मिली है। हालांकि एक बच्चे के परिजनों ने झाड़-फूंक कराया था। दूसरे बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उसकी भी 4 से 5 घंटों में मौत हो गई। सीएमएचओ के निर्देश पर पूरे गांव में लोगों का परीक्षण कराया गया है, कहीं कोई बीमारी नहीं मिली है।